भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की है। 26 फरवरी 2026 को जारी सर्कुलर के तहत SEBI ने लाइफसाइकिल फंड्स (Life Cycle Funds) नाम की नई कैटेगरी शुरू की है, जबकि सॉल्यूशन-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड्स (Solution-Oriented Mutual Funds) को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया है। यह बदलाव निवेशकों को ज्यादा पारदर्शिता, सरलता और गोल-बेस्ड निवेश में मदद करने के लिए किया गया है।
लाइफसाइकिल फंड्स क्या हैं? – निवेशकों के लिए नई सुविधा
लाइफसाइकिल फंड्स ओपन-एंडेड स्कीम्स हैं, जो गोल-बेस्ड निवेश के लिए डिजाइन किए गए हैं। इनमें पहले से तय मैच्योरिटी (परिपक्वता) होती है और ग्लाइड पाथ (Glide Path) स्ट्रैटेजी के तहत एसेट अलोकेशन ऑटोमैटिक तरीके से बदलता रहता है।
- मैच्योरिटी पीरियड: 5, 10, 15, 20, 25 या 30 साल (5 साल के मल्टीपल में)।
- एक AMC अधिकतम 6 ऐसी स्कीम्स लॉन्च कर सकती है।
- इन्वेस्टमेंट: इक्विटी, डेट, InvITs, ETCDs, गोल्ड और सिल्वर ETFs में।
- ग्लाइड पाथ का मतलब: मैच्योरिटी के करीब आने पर इक्विटी का एक्सपोजर कम होता जाता है और डेट/सुरक्षित एसेट्स बढ़ते जाते हैं। इससे रिस्क मैनेजमेंट आसान होता है और कैपिटल प्रोटेक्शन मिलता है।
- लॉन्ग-टर्म फंड्स में ज्यादा इक्विटी, जबकि 5 साल वाले फंड्स हाइब्रिड फंड्स जैसे होते हैं।
- गोल्ड/सिल्वर ETFs में अधिकतम 10% तक निवेश की अनुमति।
ये फंड्स निवेशकों को उम्र, रिस्क ऐपेटाइट और गोल (जैसे रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई) के आधार पर आसानी से चुनने में मदद करते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये फंड्स इमोशनल डिसीजन-मेकिंग और रिस्क मैनेजमेंट की समस्या को हल करते हैं।
सॉल्यूशन-ओरिएंटेड फंड्स क्यों बंद हुए?
सॉल्यूशन-ओरिएंटेड कैटेगरी में मुख्य रूप से रिटायरमेंट फंड्स और चिल्ड्रेंस फंड्स आते थे। इनमें कम से कम 5 साल का लॉक-इन होता था और फिक्स्ड एसेट अलोकेशन पर आधारित थे।
- अब ये कैटेगरी पूरी तरह बंद हो गई है।
- मौजूदा स्कीम्स में नई सब्सक्रिप्शन तुरंत बंद।
- इन स्कीम्स को SEBI की मंजूरी से समान एसेट अलोकेशन और रिस्क प्रोफाइल वाली अन्य स्कीम्स में मर्ज किया जाएगा।
- इससे 8.5 लाख से ज्यादा SIPs प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन निवेशकों को नए विकल्प मिलेंगे।
म्यूचुअल फंड कैटेगरी में अन्य महत्वपूर्ण बदलाव
- वैल्यू और कॉन्ट्रा फंड्स: अब AMC दोनों लॉन्च कर सकती है, लेकिन पोर्टफोलियो ओवरलैप 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
- सेक्टोरल/थीमेटिक फंड्स: पोर्टफोलियो ओवरलैप 50% कैप, लार्ज-कैप को छोड़कर।
- फंड ऑफ फंड्स (FOF): अब 6 ब्रॉड कैटेगरी और 15 सब-कैटेगरी में लॉन्च हो सकेंगे (एक्टिव, पैसिव या दोनों)। थीम-बेस्ड नहीं, सिर्फ ब्रॉड एसेट पर।
- कुल कैटेगरी: 36 से बढ़कर 40 हो गईं, जिसमें सेक्टोरल डेट फंड्स भी शामिल।
- पोर्टफोलियो ओवरलैप की मासिक डिस्क्लोजर अनिवार्य।
निवेशकों के लिए क्या मतलब?
ये बदलाव निवेशकों के लिए फायदेमंद हैं क्योंकि:
- गोल-बेस्ड निवेश आसान और ऑटोमैटिक रिस्क मैनेजमेंट।
- ज्यादा क्लैरिटी और कम कन्फ्यूजन।
- पुरानी स्कीम्स से नए फंड्स में शिफ्ट करने का मौका।
- इमोशनल फैक्टर्स से बचाव और लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन में मदद।
एक्सपर्ट्स जैसे श्रीधरन सुंदरम (Wallet Wealth) और प्रीति जेंडे (Apna Dhan) का मानना है कि लाइफसाइकिल फंड्स निवेश प्रक्रिया को सरल बनाएंगे और रिटायरमेंट जैसे गोल्स के लिए बेहतर विकल्प साबित होंगे।
अगर आप म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से बात करें और नए नियमों के अनुसार पोर्टफोलियो रिव्यू करें। SEBI का ये कदम म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री को और मजबूत बनाने की दिशा में है।
(नोट: निवेश से पहले बाजार जोखिमों को समझें और जरूरी दस्तावेज पढ़ें।)
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